सत्ता और समाज

कहीं तो सांसद चल रही है और बड़े दुरुस्त ढंग से चल रही है ना निलंबन की जरूरत है ना धरना प्रदर्शन की जरूरत है जरूरत है जागते हुए देखने की सत्ता और समाज बीच भ्रष्टाचार संलिप्त एक खाईं है जो समाज को निगल रही सत्ता और कुर्सी के बीच समाज पड़ गया है जहां विपक्ष या पक्ष दोनों को कुर्सी और समाज के बीच एक गहरी स्पर्धा करनी है 


हिन्दी साहित्यकार उ०प्र०  

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